दाल में क्या काला है?

माषः — उड़द / उड़द की दाल
(अथ माषः [उडद] । तस्य गुणानाह—)
माषो गुरुः स्वादुपाकः स्निग्धो रुच्योऽग्निदीपनः ।
संसन्तर्पणो बल्यः शुक्रलो बृंहणः परः ॥
शिश्नमूत्रमलः स्तन्यो मेदःपित्तकफप्रदः ।
गुदकीलादितृष्णासुपरिक्षूलानि नाशयेत् ॥
कफपित्तकरा माषाः कफपित्तकरं दधि ।
कफपित्तकरा मत्स्या वृन्ताकं कफपित्तकृत् ॥
माष (उड़द) पचने में भारी, विपाक में मधुर, स्निग्ध, रुचिवर्धक तथा वात दोष को शांत करने वाला माना गया है। यह सारक, पौष्टिक और बलवर्धक है तथा शुक्र धातु की वृद्धि करने वाला और शरीर का पोषण करने वाला माना जाता है। यह मल एवं मूत्र के निष्कासन में सहायक है। यह स्तन्यवृद्धि करता है तथा मेद और कफ दोष को बढ़ाता है। अर्श (बवासीर), चेहरे के पक्षाघात, श्वास-कष्ट तथा पाचन संबंधी विकारों के कारण होने वाले दर्द (पाचन के बाद होने वाला दर्द) में इसे उपयोगी माना गया है।
माष, दधि (दही), मत्स्य (मछली) और वृन्ताक (बैंगन) कफ-पित्त दोषों को बढ़ाने वाले माने गए हैं।
पर्याय / नाम की व्युत्पत्ति
माषः — “मीयते माषः” — इसे धान्यों में गिना जाता है।
“यह वात तथा गुदकील आदि रोगों को नष्ट करता है” — मष् धातु से, जिसका अर्थ नष्ट करना या हिंसा करना है।
“जिसके द्वारा अन्य द्रव्यों को मापा जाता है” — माष माप की एक इकाई के रूप में भी प्रयुक्त होता है।
गुणधर्म, चिकित्सीय उपयोग आदि
माष स्वाद में मधुर, बलवर्धक, शरीर की वृद्धि एवं पोषण करने वाला तथा उष्ण वीर्य वाला है। इसे वृष्य (प्रजनन शक्ति को पोषण देने वाला) और स्तन्यवर्धक माना गया है। यह कफ और पित्त दोषों को बढ़ाता है।
माष का काढ़ा जोड़ों के विकारों में दिया जाता है। हड्डियों में होने वाले दर्द के कारण उत्पन्न अनिद्रा में इसकी जड़ों का उपयोग किया जाता है।
वात दोष के कारण होने वाले विकारों में माष का आंतरिक तथा बाह्य उपयोग किया जाता है। न्यूरोलॉजिकल विकारों में भी इसका उपयोग किया जाता है।
पापड़, वड़ा तथा दक्षिण भारतीय लोकप्रिय नाश्ते — इडली और डोसा — में माष प्रमुख घटक के रूप में उपयोग होता है। इन खाद्य पदार्थों की छिद्रयुक्त एवं कोशिकीय बनावट, स्वाद और सुगंध के लिए इन्हें विशेष रूप से पसंद किया जाता है।
चूहों पर किए गए प्रयोग में माष खिलाने पर सीरम, यकृत और महाधमनी में कोलेस्ट्रॉल कम होने का उल्लेखनीय प्रभाव देखा गया। सामान्य या हाइपरकोलेस्टेरोलेमिक आहार के साथ माष दिए जाने पर सीरम फॉस्फोलिपिड का स्तर भी कम हुआ।

उंडऱ्या
सामग्री
उड़द का आटा – १ कप
पिसा हुआ मिश्रण (हरी मिर्च + हरा धनिया + जीरा) – १ चम्मच
हींग – ½ चम्मच
काली मिर्च पाउडर – ½ चम्मच
धनिया पाउडर – १ चम्मच
जीरा – १ चम्मच
करी पत्ता – ८–१० पत्ते
नमक – स्वादानुसार
घी – २ चम्मच
विधि
परात में उड़द का आटा, नमक, धनिया पाउडर, काली मिर्च पाउडर और पिसा हुआ मिश्रण डालकर अच्छी तरह मिलाएं। आवश्यकतानुसार पानी डालकर नरम आटा गूंध लें। एक बर्तन में पानी गर्म करके उबाल आने दें। एक थाली को घी से चिकना करें और आटे का लंबा रोल बनाकर उसमें रखें।
रोल को लगभग १५ मिनट तक भाप में पकाएं। ठंडा होने के बाद रोल के छोटे-छोटे टुकड़े काट लें।
कड़ाही में घी गर्म करें। इसमें जीरा, हींग और करी पत्ता डालकर तड़का लगाएं। इसमें भाप में पके हुए टुकड़े डालकर हल्का भूनें। इन टुकड़ों को चाहें तो घी या तेल में तलकर भी तैयार कर सकते हैं।
उंडऱ्या तैयार हैं!
🌿 आयुर्वेदिक लाभ
उड़द दाल पौष्टिक, गुरु और स्निग्ध गुणों वाली मानी जाती है। यह शरीर को बल और पोषण देने में सहायक हो सकती है।
जीरा, हींग और काली मिर्च पाचन को सहारा देने वाले माने जाते हैं और उड़द से होने वाली वातवृद्धि को संतुलित करने में पारंपरिक रूप से उपयोग किए जाते हैं।
धनिया पाचन में सहायक और रुचिवर्धक माना जाता है।
घी स्निग्ध होता है और वात संतुलन में सहायक माना जाता है।
हरा धनिया स्वाद और सुगंध बढ़ाता है तथा पारंपरिक रूप से पाचन में सहायक माना जाता है।
आयुर्वेदिक दृष्टि से: ये बलवर्धक, शुक्रवर्धक, पुष्टिदायक और गुरु (भारी) होती हैं। ये वायु, अरुचि तथा अर्दित वायु (जिसमें चेहरा या मुँह एक तरफ टेढ़ा हो जाता है) में लाभकारी मानी जाती हैं। बीमारी के दौरान यदि कुछ खाने की इच्छा न हो रही हो, तो इन्हें दिया जा सकता है। लेकिन ये गुरु अर्थात पचने में भारी होती हैं, इसलिए स्थिति के अनुसार केवल १–२ ही लेनी चाहिए।
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