सिंघाड़ा — कितने पानी में?

शृङ्गाटक (सिंघाड़ा)
शृङ्गाटककम्
(अथ शृङ्गाटक [सिंघाड़ा] तस्य नामानि गुणांश्चाह—)
शृङ्गाटकं जलफलं त्रिकोणफलमित्यपि ॥
शृङ्गाटकं हिमं स्वादु गुरु वृष्यं कषायकम् ।
ग्राही शुक्रानिलश्लेष्मप्रदं पित्तास्रदाहनुत् ॥
शृङ्गाटक, जलफल और त्रिकोणफल एक ही फल के समानार्थी नाम हैं।
शास्त्रीय वर्णन के अनुसार, शृङ्गाटक शीत वीर्य, मधुर रस और कषाय रस वाला है। यह गुरु, अर्थात पचने में भारी, तथा वृष्य माना गया है। इसमें ग्राहीअर्थात शोषक या बांधकर रखने वाला गुण बताया गया है। यह शुक्र धातु को पोषण देने वाला माना गया है और वात तथा कफ दोष को बढ़ा सकता है। साथ ही, इसे पित्त और रक्तदोष को शांत करने वाला तथा दाह की अनुभूति को कम करने वाला बताया गया है।
नाम और उनकी व्युत्पत्ति
शृङ्गाटक — इसके फल पर गाय के सींग के समान नुकीले उभार होते हैं, इसलिए इसे शृङ्गाटक कहा गया है।
जलफल — जल अर्थात पानी। यह जल में उगने वाले पौधे का फल है, इसलिए इसे जलफल कहा जाता है।
त्रिकोणफल — फल का आकार त्रिकोणीय होने के कारण इसे त्रिकोणफल कहा गया है।
गुणधर्म और पारंपरिक उपयोग
शृङ्गाटक के फल को शीत वीर्य, रक्तस्तम्भक और कषाय गुण वाला बताया गया है। यह दाह की अनुभूति और थकान को कम करने में सहायकमाना गया है।
इसके ताजे, कोमल गूदे को मधुर, स्वादिष्ट, पिष्टमय और पौष्टिक बताया गया है।
परंपरागत रूप से शृङ्गाटक का सेवन उपवास के दौरान किया जाता है। इससे तैयार किया गया पेय या पतला आहार (पेय/पेज जैसा) आमाशय संबंधी विकारों में, विशेष रूप से आमांश और योनि-स्राव में उपयोगी बताया गया है।
इसे पित्त-प्रकृति के व्यक्तियों तथा गर्भवती महिलाओं के लिए हितकर बताया गया है।

सिंघाड़ा ढोकला और इमली का सार
सामग्री
ढोकले के लिए
सिंघाड़े का आटा – १ कप
दही – ¾ कप
पानी – १ कप
सेंधा नमक – १ चम्मच
हरी मिर्च – १
बेकिंग सोडा – ½ चम्मच
नींबू का रस – १ चम्मच
इमली के सार के लिए
इमली का पतला गूदा/पानी – २ कप
गुड़ – ¼ कप
सेंधा नमक – १ चम्मच
लाल मिर्च पाउडर – १ चम्मच
कद्दूकस किया हुआ अदरक – १ चम्मच
हरी मिर्च – १
जीरा – १ चम्मच
तेल – २ बड़े चम्मच
विधि
एक चौड़े बर्तन में पानी उबलने के लिए रख दें।
तब तक मिक्सर जार में सिंघाड़े का आटा, दही, पानी, हरी मिर्च और सेंधा नमक डालकर थोड़ा चला लें। मिश्रण अच्छी तरह एकसार हो जाए।
इसमें नींबू का रस और बेकिंग सोडा डालकर हल्के हाथ से मिला लें।
आयुर्वेदिक सुझाव बेकिंग सोडा का पारंपरिक आयुर्वेदिक संबंध स्वर्जिकाक्षार, एक प्रकार के क्षार, से मिलता है जो सोडियम बाइकार्बोनेट से संबंधित है।
एक चौड़ी ट्रे को तेल से चिकना करें और उसमें मिश्रण डालें। लगभग १५ मिनट तक भाप में पकाएँ।
ढोकला तैयार है।
अब इमली का सार बनाते हैं। एक पैन में तेल गरम करके जीरा और हरी मिर्च का तड़का लगाएँ। इसमें इमली का पानी, सेंधा नमक, लाल मिर्च पाउडर और गुड़ डालकर अच्छी तरह उबाल लें।
इमली का सार तैयार है।
गरम सार के साथ ढोकला परोसें। ऊपर से थोड़ी सिंघाड़े की सेव या व्रत वाली सेव डालने से ढोकला और भी स्वादिष्ट और चटपटा लगता है।
आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
आयुर्वेदिक स्रोतों में सिंघाड़े (शृंगाटक) को मधुर, कषाय, गुरु और शीत बताया गया है तथा इसमें ग्राही गुण का उल्लेख मिलता है। इसे पारंपरिक रूप से अतिसार (दस्त) में उपयोग किए जाने वाले द्रव्यों में भी बताया गया है।
इमली और अदरक का सार स्वाद को बढ़ाने वाला और पाचन के संदर्भ में उपयोगी पारंपरिक संयोजन के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
आयुर्वेद में सिंघाड़े को ग्राही माना गया है, जबकि खट्टी-चटपटी इमली और अदरक का सार भोजन को स्वादिष्ट बनाने के साथ पाचन के लिए पारंपरिक रूप से उपयोग किया जाता है।
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