केला खाएँ, सेहत बनाएँ?”


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कदली, वारणा, मोचा, अम्बुसार और अंशुमत्फला केले के पर्यायवाची नाम हैं।
मोचाफल मधुर रस वाला, शीतवीर्य, वातवर्धक, कफदोष को बढ़ाने वाला तथा गुरु (पचने में भारी) है। यह स्निग्ध होता है तथा पित्त, रक्त और वात दोषों का शमन करता है। यह दाह, व्रण (फेफड़ों की गुहा से संबंधित?) और क्षय में उपयोगी बताया गया है।
जब फल अच्छी तरह पक जाता है, तब वह मधुर रस, शीत वीर्य और मधुर विपाक वाला होता है। यह वृष्य तथा शरीर की वृद्धि/बल्क बढ़ाने वाला होता है। यह अत्यधिक भूख, अत्यधिक प्यास, नेत्र रोग और मधुमेह में उपयोगी है। यह रुचि बढ़ाता है तथा मांस धातु की वृद्धि में सहायक होता है।
कदली की माणिक्य, मार्त्वा, अमृता और चम्पका आदि अनेक किस्में हैं। ऊपर बताए गए गुण इन किस्मों में अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। साथ ही, दोषों को न बढ़ाने और आसानी से पचने के गुण भी इनमें पाए जाते हैं।
पर्यायवाची शब्दों की व्युत्पत्ति
कदली‘केन वायुना दल्यते’ ‘कं जलं तद्घुतानि दलायस्याः।’
जिसके पत्ते हल्की हवा से भी फट जाते हैं, वह कदली है। इसके पत्तों में पर्याप्त जल होता है।
वारणा‘वारणवुसा’ अस्या एकदेशो ‘वारणा’ । ‘वारणानां वुसो घासः वारण तु ष्येत्येकं’ ‘वारणे: बुस्ते उत्पाट्यते इति वा।’
जिसे हाथी पसंद करता है और खाता है, वह वारणा है।
मोचा‘मुश्चति रसं मोचा’
पत्ते की डंठल काटने पर उससे रस निकलता है। ‘मुश्चति त्वचं मोचा’
इसके तने में कई परतें होती हैं।
अम्बुसार‘अम्बु वर्तते सारे यस्याः।’
जिसके आंतरिक भाग में बहुत अधिक जल होता है, उसे अम्बुसार कहा जाता है।
अंशुमत्फला‘अंशुमानिव फलान्यस्याः अंशुमत्फला, भानुफलाख्या।’
इसके गुच्छे में फल सूर्य की किरणों के समान व्यवस्थित होते हैं, इसलिए इसे भानुफला भी कहा जाता है।
गुण, उपयोग एवं वर्णन
पके हुए फल बलवर्धक, रक्तस्राव संबंधी विकारों में उपयोगी, ग्राही और पौष्टिक होते हैं। इनका उपयोग पुराने अतिसार में हितकर आहार के रूप में किया जाता है।
कच्चे फलों का अन्य औषधीय द्रव्यों के साथ मधुमेह में उपयोग किया जाता है।

केले के पौधे को जलाने से प्राप्त राख में पोटाश लवण बड़ी मात्रा में होते हैं। इसका उपयोग अम्लता, सीने में जलन और शूल में अम्लनाशक के रूप में किया जाता है।

केले के फूलों से बनाई गई सब्जी का उपयोग मधुमेह और रक्तस्राव संबंधी विकारों में किया जाता है।
तने के रस का उपयोग अपस्मार, हिस्टीरिया और अन्य वातिक विकारों में किया जाता है।

केले के फल में उपस्थित शर्कराएँ आंतों में ग्राम-पॉजिटिव या अम्लीय सूक्ष्मजीवों के समूहों को बढ़ाने तथा ग्राम-नेगेटिव सूक्ष्मजीवों को कम करने की प्रवृत्ति रखती हैं।

पका हुआ फल मधुमेह, यूरेमिया, नेफ्राइटिस, गाउट, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों में उपयोगी बताया गया है। कच्चे फल और पकाए हुए फूलमधुमेह में उपयोगी बताए गए हैं।

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केले की पूरनपोली 
सामग्री
कच्चा केला (उबला हुआ) – १
मिश्री पाउडर – १/२ कप
इलायची पाउडर – १/२ चम्मच
जायफल पाउडर – एक चुटकी
नमक – एक चुटकी
घी – २ चम्मच
राजगीरा आटा – १ कप
विधि
उबले हुए केले का छिलका निकालकर उसे कद्दूकस कर लें।
एक कड़ाही गरम करें और उसमें कद्दूकस किया हुआ केला तथा मिश्री पाउडर डालकर भून लें। फिर इलायची पाउडर और जायफल पाउडर डालकर अच्छी तरह मिलाएँ। मिश्रण थोड़ा गाढ़ा हो जाए तो गैस बंद कर दें और केले की भरावन को ठंडा होने दें।
अब एक परात में राजगीरा आटा और नमक मिलाएँ। थोड़ा-थोड़ा गुनगुना पानी डालते हुए नरम आटा गूँथ लें। हाथों पर थोड़ा तेल लगाकर आटे की छोटी-छोटी लोइयाँ बनाएँ। प्रत्येक लोई में केले की भरावन भरकर छोटी पूरनपोली बेल लें।
राजगीरा आटा थोड़ा भुरभुरा होता है, इसलिए पूरनपोली पूरी तरह गोल बनाना कठिन हो सकता है। आवश्यकता हो तो सांचे की सहायता से छोटी गोल पूरणपोली तैयार करें।
तवा गरम करें, उस पर पूरनपोली को घी लगाकर दोनों तरफ से सुनहरा और कुरकुरा सेक लें।
गरमागरम घी के साथ परोसें।

आयुर्वेदिक लाभ
🍌 शरीर को पोषण और बल प्रदान करती है – केला और राजगीरा धातुओं के पोषण तथा शरीर की मजबूती में सहायक हैं।
🔥 पाचन में सहायता करती है – इलायची और जायफल केले की गुरुता को संतुलित कर पाचन में मदद करते हैं।
दीर्घकालिक ऊर्जा प्रदान करती है – राजगीरा और प्राकृतिक मिठास शरीर को स्थिर ऊर्जा प्रदान करते हैं।
🌿 वात दोष को संतुलित करने में सहायक – मधुर रस और घी वात को शांत करने में मदद करते हैं।
ओज और स्फूर्ति बढ़ाने में सहायक – घी, केला और मिश्री शरीर को पोषण देकर ऊर्जा और उत्साह बढ़ाते हैं।


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