मूंग के बारे में 


yellow moong dal
मुदगः
(अथ मुदगः  [मूँग] स… तस्य गुणानाह—)
मुदगः रूक्षो लघुग्राही कफपित्तहरो हिमः ।
स्वादुरल्पानिलो नेत्र्यो ज्वरघ्नो व्रणशोधनः ॥
मुदगः  बहुविधः श्यामो हरितः पीतकस्तथा ।
श्वेतो रक्तश्च तेषान्तु पूर्वः पूर्वो लघुः स्मृतः॥
सुश्रुतेन पुनः प्रोक्तो हरितः प्रवरः गुणैः ।
चरकादिभिरप्युक्त एव एव गुणाधिकः ॥
अर्थ:
मुदगः अर्थात मूँग (Green Gram / Mung Bean) को आयुर्वेद में रूक्ष, लघु और ग्राही बताया गया है। यह कफ और पित्त दोष को शांत करने वाला तथा शीतल प्रकृति वाला माना गया है। इसका रस मधुर बताया गया है और यह वात दोष को थोड़ा बढ़ा सकता है। शास्त्रीय वर्णन में इसे नेत्रों के लिए हितकारी, ज्वर में उपयोगी तथा व्रण-शोधन से संबंधित बताया गया है।
मुदगः के बीजों के रंग के आधार पर इसके विभिन्न प्रकार बताए गए हैं—श्याम, हरित, पीत, श्वेत और रक्त। इनमें क्रम से पहले वाला प्रकार बाद वाले की तुलना में अधिक लघु और सुपाच्य माना गया है।
सुश्रुत ने हरित अर्थात हरे मुद्ग को गुणों की दृष्टि से श्रेष्ठ बताया है। चरक तथा अन्य आचार्यों द्वारा भी इसके अधिक गुणवान होने का उल्लेख किया गया है।

पर्याय
मुदगः — पारंपरिक व्युत्पत्ति “मोदते अनेन इति” के अनुसार, जिससे प्रसन्नता या आनंद प्राप्त हो।
वनमुदगः“वनस्य मुद्गो वनमुद्गः” — मुद्ग की वन्य या जंगली प्रजाति।

गुण एवं पारंपरिक उपयोग
मुदगः की कोमल फलियों का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता है। पके हुए बीजों को साबुत या विभाजित करके पकाया जाता है और उनसे मूँग दालबनाई जाती है।
इसके बीज स्वादिष्ट माने जाते हैं और पारंपरिक रूप से इन्हें पौष्टिक एवं हितकर आहार माना गया है। इन्हें वसा में भूनकर तथा नमक मिलाकर अल्पाहार के रूप में भी उपयोग किया जाता रहा है।
आयुर्वेदिक वर्णन के अनुसार मुद्ग लघु और शीतल है तथा अन्य कुछ दालों की तुलना में भारीपन और अधिक गैस उत्पन्न करने की संभावना कम मानी जाती है।
मुदगः के आटे का उपयोग पारंपरिक रूप से शरीर की सफाई के लिए किया जाता था और इसे साबुन के प्राकृतिक विकल्प के रूप में भी प्रयोग किया जाता रहा है।

नोट: यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेदिक वर्णनों और ऐतिहासिक उपयोगों पर आधारित है। इसे आधुनिक चिकित्सा या व्यक्तिगत आहार संबंधी सलाह न माना जाए।


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मूंग के पकोड़े
सामग्री
भीगी हुई मूंग दाल – 2 कप
हरी मिर्च – 1
अदरक – 1 छोटा टुकड़ा
हरा धनिया – आवश्यकतानुसार
करी पत्ता – आवश्यकतानुसार
वेसवार मसाला – 1 चम्मच
जीरा – 1 चम्मच
हींग – ½ चम्मच
नमक – 1½ चम्मच
दही – ½ कप (मसाला छाछ के लिए)
तेल – तलने के लिए
विधि
रातभर भिगोई हुई मूंग दाल का पानी निकालकर मिक्सर में दरदरा पीस लें। अदरक, हरी मिर्च और हरा धनिया पीसकर पेस्ट बना लें।
एक छोटे पैन में 2 चम्मच तेल गरम करें और उसमें जीरा व हींग का तड़का तैयार करें।
एक बर्तन में पिसी हुई दाल, नमक, वेसवार मसाला, हरा पेस्ट (थोड़ा छाछ के लिए बचाकर रखें), करी पत्ता और गरम तड़का डालकर अच्छी तरह मिला लें।
तेल गरम होने तक मसाला छाछ तैयार करें। दही, पानी, बचा हुआ हरा पेस्ट और नमक मिलाकर छाछ तैयार करें।
गरम तेल में पकोड़ों को सुनहरा और कुरकुरा तल लें।
इन्हें इमली की चटनी के साथ या ऐसे ही परोसें। कुछ पकोड़ों को मसाला छाछ में डालकर भी परोस सकते हैं।
छाछ में डाले हुए पकोड़े हल्के पचते हैं और स्वाद भी अधिक अच्छा लगता है।

आयुर्वेदिक लाभ
मूंग दाल हल्की, सुपाच्य और त्रिदोष संतुलित करने वाली मानी जाती है, विशेषकर पित्त और कफ के लिए हितकारी।
अदरक, जीरा, हींग, हरी मिर्च और वेसवार मसाला अग्नि को प्रज्वलित कर पाचन में सहायता करते हैं।
करी पत्ता और हरा धनिया भोजन की रुचि बढ़ाते हैं तथा पाचन को सहारा देते हैं।
छाछ दीपन, पाचन तथा वात-कफ शमन में लाभकारी मानी जाती है।
छाछ में पकोड़े डालकर खाने से तले हुए भोजन का भारीपन कम महसूस होता है।
वर्षा ऋतु या दोपहर के भोजन में सीमित मात्रा में इसका सेवन अधिक उपयुक्त माना जाता है।

ध्यान दें: तले हुए खाद्य पदार्थों का सेवन हमेशा सीमित मात्रा में करें।


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