खाने की कला!

१. भोजन की शुरुआत में क्या खाना चाहिए?
पारंपरिक आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार, भोजन की शुरुआत में सेंधा नमक और अदरक का सेवन करना चाहिए। इन्हें हितकर, जठराग्नि को प्रज्वलित करने वाला और भोजन में रुचि बढ़ाने वाला माना गया है। इनके बारे में यह भी कहा गया है कि ये जीभ और गले की सफाई में सहायक होते हैं। सेंधा नमक के गुण मधुर, अग्निदीपक, पाचक, हल्का, चिकनाईयुक्त, रुचिकर, शीतल, दृष्टि के लिए हितकारी और तीनों दोषों को संतुलित करने वाले बताए गए हैं। अदरक को मल त्याग में सहायक, गुरु, तीक्ष्ण, उष्ण, अग्निदीपक, तीखा, पचने के बाद मधुर रस वाला, रूक्ष तथा वात और कफ को संतुलित करने में सहायक बताया गया है।
२. भोजन करने का पारंपरिक क्रम
भोजन करने बैठने पर सामने परोसे गए सभी व्यंजनों पर ध्यान दें और उन्हें समझकर भोजन करें। पारंपरिक आयुर्वेदिक मार्गदर्शन के अनुसार, भोजन का क्रम इस प्रकार बताया गया है:
भोजन की शुरुआत में: मधुर रस वाले पदार्थ खाएँ।
भोजन के मध्य में: खट्टे और नमकीन स्वाद वाले पदार्थ खाएँ।
भोजन के अंत में: तीखे, कड़वे और कसैले स्वाद वाले पदार्थ खाएँ।
अनार, सेब, अंजीर और अंगूर जैसे फल उपलब्ध हों, तो उन्हें भोजन की शुरुआत में थोड़ी मात्रा में खाया जा सकता है। हालांकि, इस ग्रंथ के अनुसार केले और खीरे का सेवन भोजन की शुरुआत में नहीं करना चाहिए। कमल का डंठल, कमलनाल, कमल-कंद और गन्ने का कोमल भाग जैसे पदार्थ भोजन से पहले खाने की सलाह दी गई है। इन्हें भोजन के अंत में नहीं खाना चाहिए। मैदे या आटे से बने भारी पदार्थ, पोली, लड्डू, पोहा और इसी तरह के अन्य खाद्य पदार्थ भोजन समाप्त होने के बाद नहीं खाने चाहिए। वास्तविक भूख लगने पर उचित मात्रा में भोजन करें और अतिभोजन से बचें।
३. भोजन के बनावट और गाढ़ेपन के अनुसार क्रम
ग्रंथ में भोजन की शुरुआत घी के साथ भोजन करने से करने की सलाह दी गई है, जैसे घी मिला हुआ चावल। इसके बाद पहले कठोर या ठोस पदार्थ, फिर नरम पदार्थ और अंत में तरल पदार्थ खाने चाहिए। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, इस क्रम से भोजन करने पर बल और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
इसी विषय में एक अन्य क्रम भी बताया गया है:
शुरुआत में मध्यम तरलता वाले पदार्थ खाएँ। इनके तुरंत बाद बहुत अधिक पानी न पिएँ।
भोजन के मध्य में लड्डू, चपाती, भाकरी और वड़े जैसे ठोस पदार्थ खाएँ। इस चरण में अपनी आवश्यकता के अनुसार पानी पिएँ। स्वादिष्ट और मधुर पदार्थों का सेवन धीरे-धीरे करें।
ग्रंथ में यह भी कहा गया है कि जिस भोजन को समाप्त करने के बाद भी उसके स्वाद को दोबारा चखने की इच्छा हो, उसे रुचिकर भोजन माना जा सकता है।
४. मधुर रस वाले खाद्य पदार्थों के गुण
मधुर रस वाले खाद्य पदार्थ मन को प्रसन्न करने, बल बढ़ाने, शरीर का पोषण करने, उत्साह उत्पन्न करने और जीभ को सुखद अनुभव देने वाले माने गए हैं। जिन पदार्थों में मधुर रस के गुण नहीं होते, उनमें इसके विपरीत गुण पाए जाते हैं, ऐसा ग्रंथ में वर्णित है।
५. भोजन का तापमान और खाने की गति
पारंपरिक ग्रंथ के अनुसार, अत्यधिक गर्म भोजन करने से बल में कमी आ सकती है, जबकि ठंडा और रूखा भोजन पचाने में कठिन हो सकता है। चावल पकने के तुरंत बाद, उसकी भाप शांत होने से पहले खाने पर थकान या असहजता उत्पन्न हो सकती है, ऐसा वर्णन किया गया है। इसलिए भोजन उचित तापमान और सही अवस्था में करना चाहिए। बहुत तेजी से भोजन करने पर व्यक्ति भोजन के गुणों और दोषों को ठीक से अनुभव नहीं कर पाता। इसके विपरीत, बहुत धीरे-धीरे खाने से भोजन ठंडा हो सकता है और उसकी रुचि कम हो सकती है।
६. गुरु आहार क्या है?
जिन लोगों की जठराग्नि मंद होती है, उन्हें पारंपरिक आयुर्वेदिक मार्गदर्शन के अनुसार पचने में भारी खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए। गुरु आहार के तीन प्रकार बताए गए हैं:
1. मात्रागुरु — मात्रा के कारण भारी: मूंग और अरहर की दाल जैसे पदार्थ अधिक मात्रा में खाने पर पचने में भारी हो सकते हैं।
2. स्वभावगुरु — स्वभाव से भारी: उड़द और पावटे जैसी फलियाँ स्वाभाविक रूप से पचने में भारी मानी गई हैं।
3. संस्कारगुरु — बनाने की विधि के कारण भारी: आटे से बने उंडे, वड़े और इसी तरह के कुछ पदार्थ अपनी तैयारी की विधि के कारण पचने में भारी हो सकते हैं।
ये उदाहरण समझाने के लिए दिए गए हैं। इसी प्रकार अन्य खाद्य पदार्थों के गुणों को भी समझना चाहिए।
७. भोजन के दौरान वात, पित्त और कफ के तीन चरण
ग्रंथ में भोजन शुरू करने से लेकर समाप्त करने तक के समय को तीन भागों में बाँटा गया है:
पहला चरण — वात: भोजन की शुरुआत में खाया गया मधुर रस वात दोष को शांत करने वाला माना गया है।
मध्य चरण — पित्त: भोजन के बीच में लिए गए खट्टे, नमकीन और मधुर रस पित्त से संबंधित पाचन अग्नि को बढ़ाने वाले बताए गए हैं।
अंतिम चरण — कफ: भोजन के अंत में लिए गए तीखे, कड़वे और कसैले रस कफ दोष को शांत करने वाले माने गए हैं।
यह व्याख्या पारंपरिक आयुर्वेदिक अवधारणाओं पर आधारित है।
८. भोजन के अंत में दूध क्यों पीना चाहिए?
एक प्रश्न उठता है: दूध मधुर, चिकनाईयुक्त, गुरु, शीतल और कफ बढ़ाने वाला माना जाता है। फिर भोजन के अंत में दूध पीने की सलाह क्यों दी गई है?
ग्रंथ के अनुसार, भोजन के दौरान कुछ खाद्य पदार्थों या पेय पदार्थों के सेवन से शरीर में जलन या विदाह उत्पन्न हो सकता है। इस असहजता को शांत करने के लिए भोजन के अंत में दूध पीने की सलाह दी गई है। एक अन्य मत के अनुसार, भोजन में खट्टे, नमकीन, तीखे और उष्ण गुणों वाले पदार्थों के सेवन से विदाह हो सकता है। इसके प्रभाव को कम करने के लिए भोजन का समापन दूध जैसे मधुर रस वाले पदार्थ से करना चाहिए।
संपादकीय टिप्पणी: यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णित मार्गदर्शन पर आधारित है। इसे प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य भोजन-नियम या सभी परिस्थितियों में लागू होने वाली सलाह नहीं समझना चाहिए।

आयुर्वेदिक थाली
– अदरक की चटनी
– सूखी मूंग दाल
– उंडऱ्या
– सादा दाल (आयुर्वेदिक विधि से बना) -चावल
– रोटी
– लाल कद्दू की सब्ज़ी
– ताकतव
– दधिपुपक
अन्न को ब्रह्म, उसके रस को विष्णु और भोजन करने वाले को देव महेश्वर (शिव) मानकर भोजन करने से दृष्टिदोष की बाधा नहीं होती, ऐसा पारंपरिक ग्रंथों में वर्णित है।
पेड़ के पत्तों से बनी पत्रावली या पत्तों का पात्र रुचि उत्पन्न करने वाला और अग्नि को प्रदीप्त करने वाला माना गया है तथा इसे विष और पाप का नाश करने वाला बताया गया है।
भोजन के आरंभ में नमक (सैंधव) और अदरक का सेवन करना चाहिए। इन्हें पथ्यकर, अग्निदीपक और रुचि उत्पन्न करने वाला माना गया है तथा दीपन, पाचन और त्रिदोषनाशक के रूप में वर्णित किया गया है।
अदरक को मल के निष्कासन में सहायक, तीक्ष्ण तथा वात-कफ नाशक बताया गया है।
भोजन क्रम — सबसे पहले मधुर रस वाले पदार्थों का सेवन करना चाहिए। भोजन के बीच में खट्टे और नमकीन रस वाले पदार्थ लेने चाहिए। अंत में तीखे, कड़वे और कसैले रस वाले पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
भोजन की शुरुआत में थोड़ा घी-भात खाना चाहिए। पहले कठोर पदार्थ, उसके बाद मृदु पदार्थ और अंत में द्रव पदार्थ लेने चाहिए।
सबसे अंत में छाछ लेनी चाहिए और भोजन के बाद तांबूल का सेवन करना चाहिए।
तांबूल तीक्ष्ण, रुचिकर, कसैला और कड़वा होता है। यह कफ, मुख की दुर्गंधि, मल, वायु और थकान को दूर करने वाला, मुख को स्वच्छ एवं सुगंधित करने वाला तथा जिह्वा को शुद्ध करने वाला माना गया है।
ठोस भोजन से पेट का आधा भाग, तरल पदार्थों से एक-चौथाई भाग भरना चाहिए और शेष एक-चौथाई भाग खाली रखना चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार, यह खाली स्थान पाचन के लिए आवश्यक है। पेट की तुलना मिक्सर से करें—थोड़ी जगह होने पर भोजन का मिश्रण और गति बेहतर होती है।
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