एक पान, पाचन आसान!


naagvel
नागवल्ली Nāgavallī / नागवेल / ताम्बूल
(अथ नागवल्ली [मान] । तस्य नामानि गुणाश्च —)
ताम्बूलवल्ली ताम्बूली नागिनी नागवल्ली ।
ताम्बूलं विशदं यस्य तांबूलस्य तुर्वं समम् ॥१॥
भावप्रकाश निघण्टु
ताम्बूलवल्ली, ताम्बूली, नागवल्ली और नागिनी नागवल्ली के समानार्थी नाम हैं।
नागवल्ली को मुख को शुद्ध करने वाली, रुचि बढ़ाने वाली, तीक्ष्ण एवं उष्ण वीर्य वाली, कटु, रेचक, वात और कफ का शमन करने वाली, सुगंधित तथा स्वर के लिए हितकारी बताया गया है। इसे रक्त और पित्त दोष को बढ़ाने वाली तथा कषाय गुण वाली भी बताया गया है। यह कफदोष, मुख की दुर्गंध और थकान को दूर करने तथा वात को शांत करने में सहायक मानी गई है।
समानार्थी नाम
• ताम्बूलवल्ली
‘ताम्बूल’ शब्द की व्युत्पत्ति के संदर्भ में इसे प्रारंभ में उत्साहवर्धक और बाद में कुछ शिथिलता उत्पन्न करने वाला बताया गया है।
ताम्बूलवल्ली नाम ताम्बूल तैयार करने में उपयोग होने वाली नागवल्ली के लिए प्रयुक्त होता है। यहाँ ‘ताम्बूल’ का अर्थ केवल सुपारी नहीं है, बल्कि नागवेली के पत्ते, चूना, सुपारी आदि से तैयार किए जाने वाले वीटिका या पान से है।
‘ताम्बूल’ शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में आचार्य बापालालजी ने उल्लेख किया है कि पानी के अभाव में नागवेली का पत्ता शीघ्र सूख जाता है; इसलिए इसे ताम्बूलवल्ली कहा जाता है। यह व्युत्पत्ति सुपारी के संदर्भ में लागू नहीं होती।
• नागिनी – नागवल्लरी
ताम्बूल या सामान्य रूप से पान, भारत में प्राचीन काल से ही चबाया जाता रहा है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसके उपयोग और आयुर्वेदिक कर्मों का वर्णन मिलता है।
पिछली शताब्दी तक भारत में विभिन्न समुदायों, जिसमें मुस्लिम समुदाय भी शामिल है, के बीच अतिथि के सम्मान के प्रतीक के रूप में पान देने की परंपरा थी।
बाद में पान के साथ तंबाकू का उपयोग जुड़ गया। वर्तमान में शहरों में पान की दुकानों पर जर्दा आदि विभिन्न रूपों में इसे बेचा जाता है। तंबाकू व्यसनकारी और कैंसरजनक होने के कारण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है तथा मुख के कैंसर जैसी समस्याओं से जुड़ा हो सकता है।
इस संबंध में कोई भी विवाद हो, पान के साथ तंबाकू के सेवन से बचना चाहिए।
फिर भी पान की परंपरा भारत में आज भी लोकप्रिय है। ताम्बूल के विषय में कुछ ग्रंथ पांडुलिपि के रूप में भी उपलब्ध हैं, जैसे ताम्बूल मंजरी आदि।
गुणधर्म एवं उपयोग
ताम्बूलस्य तीक्ष्णोष्णं कटुकपाकप्रशमनम् ।
सुगन्धि दीपनं वातकफप्रशमनम् ।
रुच्यं स्वर्यं पाचकं कषायं वातपित्तनाशनम् ।
कफकण्डूमलम्लेददुर्गन्धि-हरं च ॥
ताम्बूल का पत्ता तीक्ष्ण और उष्ण वीर्य वाला है तथा इसका स्वाद कटु बताया गया है। यह पित्त दोष को बढ़ाता है। इसे सुगंधित, मुखशोधक, तिक्त, स्वर के लिए हितकारी तथा वात-कफ दोष को शांत करने वाला बताया गया है।
यह रेचक, कटु विपाक वाला और कषाय गुणयुक्त भी माना गया है। यह पाचनाग्नि को प्रोत्साहित करने, मुख को साफ करने तथा खुजली, नमी और मुख की दुर्गंध को दूर करने में सहायक बताया गया है।
ताजे पत्ते और उनका रस पाचनशक्ति को बढ़ाने वाला, उष्ण, कफ-वात दोष को शांत करने वाला, व्रणरोपक, रोगाणुरोधी, कफोत्सारक, सूजन कम करने वाला और वेदनाशामक बताया गया है।
पत्तों का रस अथवा वीडा (वीटिका) अनुपान के रूप में उपयोग किया जाता है।
कफ दोष के कारण होने वाले श्वसन विकारों, जैसे ब्रॉन्काइटिस, ब्रॉन्कियल अस्थमा और लैरिंजाइटिस में पत्तों के रस का उपयोग बताया गया है। बच्चों में श्वास-कष्ट, ब्रॉन्काइटिस और सर्दी जैसी स्थितियों में भी इसके उपयोग का वर्णन मिलता है।
इसके लिए पत्तों पर अरंडी का तेल लगाकर उन्हें हल्का गर्म करके परत के रूप में लगाने की पद्धति वर्णित है।
परंपरागत उपयोग
चार पत्तों का रस थोड़े गुनगुने पानी के साथ गरारे करने के लिए उपयोग किया जाता है।
गर्म पानी में तेल की एक बूंद मिलाकर भाप लेने के लिए उपयोग किया जाता है।
गर्म किए हुए पत्तों को ग्रंथियों की सूजन और फोड़े पर लगाया जाता है। इसी प्रकार गर्म पत्तों को स्तन पर लगाकर दूध के प्रवाह को कम करने और सूजन घटाने के लिए उपयोग किए जाने का वर्णन है।
कोंकण में फलों का उपयोग खांसी में किया जाता है।
ओडिशा में काली मिर्च के साथ पतली जड़ों का उपयोग महिलाओं में गर्भधारण रोकने के लिए किए जाने का वर्णन है।
एरंड के तेल में डुबोए हुए पत्ते के कोमल डंठल का उपयोग कब्ज और पेट फूलने से पीड़ित बच्चे के मलाशय में करने का वर्णन है।
मात्रा — पत्तों का रस: ५–१० मि.ली.
नोट: ऊपर बताए गए गुणधर्म और पारंपरिक उपयोग शास्त्रीय एवं पारंपरिक आयुर्वेदिक साहित्य में वर्णित हैं। इन्हें केवल शैक्षणिक और ऐतिहासिक संदर्भ के लिए प्रस्तुत किया गया है। इन्हें पेशेवर चिकित्सकीय सलाह या उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। तंबाकू के साथ पान का सेवन करने की सलाह नहीं दी जाती है।

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ताम्बूल
सामग्री
पान के पत्ते (नागवेल के पत्ते) – १०–१२
सौंफ – १ चम्मच
सूखा नारियल – १ चम्मच
अजवाइन – ½ चम्मच
केसर – ¼ चम्मच
जायफल पाउडर – ¼ चम्मच
भीमसेनी कपूर – छोटा टुकड़ा
मिश्री – २ टुकड़े
लौंग – ३
इलायची (दाने निकालकर) – २
विधि
नागवेल के पत्तों को अच्छी तरह धोकर साफ कपड़े से पोंछकर सुखा लें। पत्तों को बारीक काट लें। सभी सामग्री को मिक्सर में हल्का पीस लेना भी ठीक है। पारंपरिक विधि से सभी सामग्री को खरल या ओखली-मूसल में डालकर अच्छी तरह कूट लें। ताम्बूल तैयार है।
🌿 आयुर्वेदिक लाभ
आयुर्वेद में ताम्बूल का पारंपरिक उपयोग मुख्य रूप से भोजन के बाद मुखशुद्धि और पाचन में सहायता के लिए किया जाता है।
पाचन में सहायक: नागवेल के पत्ते, अजवाइन, सौंफ, लौंग और इलायची पाचन को सहारा देने वाले दीपन-पाचन गुणों के लिए पारंपरिक रूप से उपयोग किए जाते हैं।
वात-कफ संतुलन में सहायक: इसके उष्ण और सुगंधित द्रव्य वात-कफ से संबंधित भारीपन में सहायक हो सकते हैं।
मुख की दुर्गंध कम करने में सहायक: लौंग, इलायची और नागवेल के पत्ते मुख को ताजगी प्रदान करते हैं।
भोजन के बाद भारीपन में सहायक: मसालों के पाचक गुण भोजन के बाद होने वाले भारीपन में सहायता कर सकते हैं।
भूख को बढ़ाने में सहायक: अजवाइन और अन्य सुगंधित द्रव्य पारंपरिक रूप से दीपन के लिए उपयोग किए जाते हैं।
नोट: तांबूल किसी बीमारी का उपचार या दवा का विकल्प नहीं है। इसका सेवन सीमित मात्रा में करें। भीमसेनी कपूर केवल खाद्य-गुणवत्ता (food-grade) वाला ही इस्तेमाल करें।
हमारे द्वारा खाए गए सभी भोजन का अच्छी तरह पाचन होने के लिए लार से लेकर पेट में बनने वाले पाचक रसों तक सभी स्रावों का उचित मात्रा में निर्माण होना आवश्यक है। इसके लिए पान के पत्ते का उपयोग किया जाता है। ताम्बूल में मौजूद घटकों के कारण पाचन में सहायता मिलती है और पेट जल्दी हल्का महसूस होने में मदद मिलती है।


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