दही कब खाए? कब ना खाए ?

दही के गुण
आयुर्वेद के अनुसार दधि (दही) उष्ण वीर्य वाला, अग्निदीपक, स्निग्ध और गुरु होता है। इसका उपरसा कषाय तथा विपाक अम्ल होता है। यह पित्त, रक्त और कफ दोष को बढ़ा सकता है तथा शोफ और मेद की वृद्धि कर सकता है।
दही का उपयोग आयुर्वेद में मूत्रकृच्छ्र (पेशाब करने में कठिनाई), प्रतिश्याय (नाक से संबंधित विकार), विषमज्वर, अतिसार, अरुचि और कृशता में बताया गया है। यह बल और शुक्र की वृद्धि करने वाला भी माना गया है।
दही के पाँच प्रकार
आयुर्वेद में दही के पाँच प्रकार बताए गए हैं:
१. मन्द दधि
मन्द दही दूध के समान होता है। इसका स्वाद स्पष्ट रूप से अनुभव नहीं होता और यह थोड़ा गाढ़ा होता है। यह मूत्र एवं मल के निष्कासन में सहायक बताया गया है। यह तीनों दोषों को बढ़ा सकता है तथा पाचन के दौरान अम्लता/जलन उत्पन्न कर सकता है।
२. स्वादु दधि
स्वादु दही अच्छी तरह जमा हुआ और मुख्यतः मीठा होता है, जिसमें खट्टापन स्पष्ट नहीं होता। इसे अत्यभिष्यन्दि अर्थात सूक्ष्म स्रोतसों को अवरुद्ध करने की अधिक प्रवृत्ति वाला बताया गया है। यह वृष्य, मेद और कफवर्धक, वातशामक तथा विपाक में मधुर होता है। यह रक्त और पित्त को शांत करने वाला भी बताया गया है।
३. स्वाद्वम्ल दधि
स्वाद्वम्ल दही कुछ गाढ़ा होता है और इसका स्वाद मीठा होता है, जिसमें कषाय उपरसा होता है। इसके गुण सामान्य दही के समान बताए गए हैं।
४. अम्ल दधि
जिस दही का मधुर स्वाद समाप्त होकर खट्टा स्वाद स्पष्ट रूप से प्रकट हो जाए, उसे अम्ल दधि कहा गया है। यह अग्नि को प्रदीप्त करता है तथा पित्त, रक्त और कफ दोष को बढ़ाता है।
५. अत्याम्ल दधि
अत्यधिक खट्टा दही दाँतों में झनझनाहट, रोमांच तथा गले में जलन उत्पन्न कर सकता है। यह पाचन शक्ति को बढ़ाता है और रक्त, वात तथा पित्त को बहुत अधिक बढ़ा सकता है।
गाय के दूध से बना दही
गाय के दूध से बना दही विशेष रूप से मधुर-अम्ल, रुचिकर, पवित्र और अग्निदीपक बताया गया है। यह हृदय के लिए हितकर, पौष्टिक और वातशामक है तथा सभी प्रकार के दही में श्रेष्ठ माना गया है।
भैंस के दूध से बना दही
भैंस के दूध का दही अत्यंत स्निग्ध, कफवर्धक, वात-पित्तशामक, विपाक में मधुर, अभिष्यन्दि, वृष्य और गुरु होता है। यह रक्त को भी दूषित करने वाला बताया गया है।
उबले हुए दूध से बना दही
उबले हुए दूध से बना दही रुचिकर, स्निग्ध और गुणों में श्रेष्ठ होता है। यह पित्त और वात को शांत करता है तथा शरीर के सभी धातुओं की अग्नि और बल को बढ़ाने वाला बताया गया है।
मलाई निकाले हुए दूध से बना दही
जिस दूध की मलाई निकाल दी गई हो, उससे बना दही कषाय, शीतवीर्य, वातवर्धक और लघु होता है। यह गैस उत्पन्न कर सकता है, पाचन शक्ति को बढ़ाता है, रुचि उत्पन्न करता है और ग्रहणी रोग में उपयोगी बताया गया है।
कपड़े से छाना हुआ दही
कपड़े से छाना हुआ दही स्निग्ध, वातशामक, कफवर्धक और गुरु होता है। यह बल एवं पोषण बढ़ाता है, रुचिकर और मधुर होता है तथा पित्त को बहुत अधिक नहीं बढ़ाता।
शक्कर के साथ दही
शक्कर के साथ लिया गया दही श्रेष्ठ माना गया है। यह तृष्णा, पित्त, रक्त और दाह को शांत करने वाला बताया गया है।
गुड़ के साथ लिया गया दही वातशामक, वृष्य, बृंहण, तर्पणकारी और गुरु होता है।
⚠️ दही का निषेध
आयुर्वेद के अनुसार रात में दही का सेवन नहीं करना चाहिए, जब तक कि उसे उचित पदार्थों के साथ न लिया जाए।
रात में दही लेते समय इसमें निम्न में से उचित पदार्थ मिलाने का उल्लेख मिलता है:
घी
शक्कर
मूंग का सूप
शहद
आंवला
दही को गर्म करके भी नहीं खाना चाहिए।
ऋतु के अनुसार दही का सेवन
दही का सेवन इन ऋतुओं में हितकर बताया गया है:
हेमंत — प्रारंभिक शीत ऋतु
शिशिर — उत्तर शीत ऋतु
वर्षा — वर्षा ऋतु
इन ऋतुओं में सामान्यतः दही का सेवन वर्जित बताया गया है:
शरद
ग्रीष्म
वसंत
अनुचित या अधिक सेवन
जो व्यक्ति दही का बहुत अधिक सेवन करता है और उचित सेवन-विधि की उपेक्षा करता है, उसके लिए ग्रंथ में ज्वर, रक्तविकार, विसर्प, त्वचा विकार, पाण्डु/रक्ताल्पता, मूर्च्छा तथा गंभीर कामला जैसी स्थितियों का वर्णन किया गया है।
🥛 दधिसार एवं मस्तु
दही का ऊपरी ठोस, स्निग्ध भाग दधिसार कहलाता है।
दही के नीचे स्थित पतला तरल भाग दधिमण्ड या मस्तु कहलाता है।
दधिसार
मधुर दधिसार गुरु और वृष्य होता है तथा वात और जठराग्नि को शांत/समर्थन करने वाला बताया गया है।
अम्ल दधिसार मूत्राशय संबंधी विकारों में उपयोगी तथा पित्त और कफवर्धक बताया गया है।
मस्तु – थकान दूर करने वाला, बलवर्धक, लघु, भूख बढ़ाने वाला, सूक्ष्म स्रोतसों को स्वच्छ करने वाला
तृप्तिदायक, कफशामक, तृष्णाशामक, वातशामक तथा पौष्टिक बताया गया है।
इसे अवृष्य तथा संचित अपशिष्ट पदार्थों को शीघ्र हटाने में सहायक बताया गया है।

दही लड्डू
सामग्री
गाढ़ा दही (हंग कर्ड) – १ कप
मिश्री पाउडर – १ कप
चावल का आटा – १ कप
घी – तलने के लिए
इलायची – २
नमक – १/२ छोटा चम्मच
इस मात्रा से लगभग १२–१३ लड्डू बनते हैं।
विधि
दही को कपड़े में बांधकर पानी निकलने दें। उसमे आवश्यकतानुसार चावल का आटा और नमक डालकर मुलायम आटा गूँथ लें। सामान्यतः १ कप गाढें दही के लिए १ कप चावल का आटा पर्याप्त होता है। ध्यान रखें कि दही अधिक खट्टा न हो।
दूसरे बर्तन में पानी उबालें। उसमें इलायची और मिश्री पाउडर डालकर एक तार की चाशनी तैयार करें।
कड़ाही में घी गरम करें। आटे के छोटे-छोटे गोले बनाकर धीमी आँच पर सुनहरा होने तक तलें। तले हुए गोलों को तैयार चाशनी में डालकर कुछ समय के लिए भीगने दें।
दही लड्डू तैयार हैं।ये लड्डू गुलाब जामुन जितने नरम नहीं होते, ये अंदर से नरम और बाहर से थोड़े सख्त होते हैं।
इस दही हांडी के त्यौहार में भगवान श्रीकृष्ण को दही लड्डू का नैवेद्य अर्पित करें।
आयुर्वेदिक लाभ
ताज़े चक्के के कारण यह शरीर को पोषण और बल प्रदान करने में सहायक है।
चावल का आटा लड्डुओं को हल्की और मुलायम बनावट देता है।
ये लड्डू स्वादिष्ट होते हैं तथा वात-पित्त को संतुलित करने और दाह (जलन) को शांत करने में सहायक
माने जाते हैं।
आयुर्वेद के अनुसार ताज़ा और अधिक खट्टा न हुआ दही अधिक हितकारी माना जाता है। दही का सेवन मुख्यतः दिन के समय, ताज़ा और सीमित मात्रा में करना उचित माना गया है।
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